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रफी साहब की आवाज में वो कशिश थी जो रूह को छू लेती थी। उनके उदास गानें सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि एक अहसास हैं।

जहाँ किशोर दा अपनी मस्ती के लिए जाने जाते थे, वहीं उनके 'Melancholy' (उदासी) वाले गाने अकेलेपन के सबसे अच्छे साथी हैं। 'दिन ढल जाए'

'क्या हुआ तेरा वादा', 'दिन ढल जाए', और 'ओ दुनिया के रखवाले'। 'शीशा हो या दिल हो'

यह पोस्ट 90 के दशक और उससे पहले के उन सदाबहार गानों का एक खूबसूरत संग्रह है, जो आज भी हमारे दिल के सबसे करीब हैं। जब बात दर्द भरे या 'Sad Songs' की आती है, तो इन तीन दिग्गजों की आवाज़ का कोई मुकाबला नहीं: और 'लग जा गले'।

दीदी की आवाज में वो ठहराव और दर्द था जो आँखों में आँसू ला देता था। 90 के दशक में भी उन्होंने कई यादगार गमगीन गाने दिए।

'लुका छुपी', 'शीशा हो या दिल हो', और 'लग जा गले'।