एक परिवार में दादा-पोती या नाना-नतिनी का रिश्ता निस्वार्थ प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। जब यही प्रेम अपनी सीमाएं लांघकर 'नाजायज' मोड़ ले लेता है, तो वह केवल एक रिश्ता नहीं टूटता, बल्कि उस मासूम का पूरा संसार उजड़ जाता है। वह सुरक्षा, जो उसे घर की चारदीवारी में मिलनी चाहिए थी, वहीं से डर का जन्म होने लगता है।
रिश्तों की खूबसूरती उनकी मर्यादाओं में है। प्यार जब अपनी सीमाएं भूलकर वासना का चोला ओढ़ लेता है, तो वह 'रिश्ता' नहीं, बल्कि एक 'कलंक' बन जाता है। हमें एक ऐसे समाज की जरूरत है जहाँ घर के बड़े बच्चों के लिए ढाल बनें, न कि उनके बचपन को कुचलने वाले शिकारी।
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1. भरोसे का कत्ल (The Betrayal of Trust)
अक्सर मनोरंजन या कहानियों के नाम पर ऐसे विषयों को 'सनसनीखेज' बनाकर पेश किया जाता है। लेकिन असल जिंदगी में यह कोई फिल्मी ड्रामा नहीं, बल्कि एक घिनौना अपराध है। 'सगे संबंध' जब अपनी गरिमा खो देते हैं, तो वे केवल कानूनी नजर में ही नहीं, बल्कि मानवता की नजर में भी अक्षम्य हो जाते हैं।